राजकीय मेडिकल कालेज जम्मू में जहां प्रिंसिपल बनने के लिए वरिष्ठ प्रोफेसरों में होड़ सी लगी रहती है। वहीं जम्मू संभाग के ही डोडा मेडिकल कालेज में कोई वरिष्ठ प्रोफेसर प्रिंसिपल बनने को तैयार नहीं। वर्तमान प्रिंसिपल ने भी नौकरी छोड़ दी है और सरकार से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया है। छह वर्ष में तीन प्रिंसिपल बीच में ही नौकरी छोड़ चुके हैं।
डोडा मेडिकल कालेज में पहला शैक्षणिक सत्र 2020-21 में शुरू हुआ था। उस समय कालेज को पचास ही सीटें मिली थी लेकिन इसके बाद पचास और सीटें बढ़ा दी गई थीं। लेकिन कालेज में प्रिंसिपल के साथ-साथ संकाय की कमी बड़ी समस्या रही है।
डॉ. तारिक आजाद के बाद बदले कई चेहरे
पहले प्रिंसिपल डॉ. तारिक आजाद जीएमसी जम्मू में सर्जरी विभाग के प्रोफेसर थे लेकिन डोडा के ही रहने वाले थे। उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद डॉ. नूर अली ने कुछ महीनों के लिए पदभार संभाला। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इसके बाद जीएमसी जम्मू से प्रीवेंटिव सोशल मेडिसिन के एचओडी डॉ. दिनेश कुमार को अतिरिक्त प्रभार सौंपा। लेकिन वे समय से पहले ही सेवानिवृत्ति लेकर चले गए।
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इसके बाद सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल में एनेस्थीसिया विभाग की एचओडी डॉ. पूजा विमेश को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया, लेकिन उन्होंने भी कुछ समय बाद स्वास्थ्य कारणों का हवाला दे पद छोड़ दिया।
डोडा के बाद कठुआ-राजौरी जीएमसी में भी चुनौती
डॉ. राकेश बनाल इसके बाद प्रिंसिपल बने और उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। इसी वर्ष मार्च महीने में श्री महाराजा गुलाब सिंह अस्पताल में त्वचा रोग विभाग के एचओडी डॉ. देवराज डोगरा को डोडा जीएमसी के प्रिंसिपल का अतिरिक्त प्रभार दिया गयाा, लेकिन उन्होंने दो महीनों के बाद ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया। अब उन्होंने पद भी छोड़ दिया। यह उस समय हुआ जब कालेज में एमबीबीएस के नए बैच की प्रवेश प्रक्रिया शुरू हुई है।
जीएमसी कठुआ और राजौरी में भी इसी प्रकार की स्थिति रही। कुछ प्रिंसिपलों ने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही अपना तबादला करवा लिया। सभी वरिष्ठ प्रोफेसर जीएमसी जम्मू का ही प्रिंसिपल बनना चाहते हैं।
आगे की राह भी आसान नहीं
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के लिए आगे की राह भी आसान नहीं है। डोडा मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल के पद छोड़ने के बाद उनके लिए नए प्रिंसिपल को तैनात करना आसान नहीं है। डॉ. देवराज डोगरा के बाद के वरिष्ठ प्रोफेसर भी डोडा जीएमसी में प्रिंसिपल बनने में रूचि नहीं दिखा रहे हैं।
एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने बताया कि अगर उन्हें सरकार जबरदस्ती प्रिंसिपल नियुक्त करती हैं तो उनके पास स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्ति लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग को पहले ही डाेडा में प्रिंसिपल नियुक्त करने में काफी समय लगा था।
सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं
जीएमसी जम्मू के कई वरिष्ठ प्रोफेसर यह मानते हैं कि प्रिंसिपल नियुक्त करने में कोई भी स्पष्ट नीति नहीं है। यह जरूर नहीं है कि सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर बेहतर प्रिंसिपल भी साबित हो। कुछ प्रोफेसर जो प्रिंसिपल बनने में रूचि दिखाते हैं, उन्हें सरकार नियुक्त नहीं करती है।
जीएमसी जम्मू में डोडा के भी कुछ स्थानीय डाक्टर नौकरी कर रहे हैं। अगर डोडा के ही रहने वाले किसी योग्य प्रोफेसर को जीएमसी जम्मू से डोडा भेजा जाता है तो समस्या का समाधान हो सकता है। सरकार ने पहले भी ऐसे ही नियुक्तियां की थी और वे काफी सफल रही थीं।
नए कालेजों में कोई योग्य नहीं
अभी नए मेडिकल कालेजों को स्थापित हुए छह से सात वर्ष ही हुए हैं। प्रिंसिपल बनने के लिए न्यूनतम पांच वर्ष तक प्रोफेसर का अनुभव होना चाहिए। डोडा में तो ऐसा कोई भी नहीं है। यही नहीं इस कालेज में संकाय के भी साठ प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं।







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